शुक्रवार, 11 नवंबर 2016


घंटे भर के कष्ट पर अवसाद क्यों

 
जब दो दिनों के लिए आपके हाथों में बड़े बड़े नोट नहीं रहे
तो आप घनघोर असुरक्षा की भावना और अवसाद में घिर गये,
त्राहि त्राहि करते रहे,
आपकी नींद उड़ गई, चैन गायब हो गया, टेंशन हो गया |
तो बताइए वे ६० करोड़ लोग जिनके हाथ (by default) पैसे ही नहीं रहते,
आज यदि हैं तो कल का भरोसा नहीं,
उन्हें तो हमेशा अवसाद में ही घिरा होना चाहिये, कभी सोना ही नहीं चाहिये
हाथ पर हाथ धरे व्यवस्था को कोसना चाहिये,
पर नहीं
वे तो सुबह ही उठकर सेवाकार्य में लग जाते हैं
ताकि आप जब उठें तो आप का दिन सुखकर हो,

आपके धैर्य की प्रतीक्षा तो उसी समय हो गई, जब सारे कर्तव्य छोडकर आपने अपनी अहंकार तुष्टि के लिए एक दिन पंक्ति में खड़े होकर 2-4 नोटों के लिए पूरा दिन खराब कर दिया, नोट मिले तो हुश..श..श करते हुए वापिस लौट आये,
उनका क्या जो 6 दिन काम करने के बाद, ठेकेदार या बैंक से मजदूरी के पैसे पाने की आस में घंटों लाइन में, भूखे प्यासे, खड़े रहते हैं|
उनका क्या जो आपकी लाइन के आसपास दिन भर घूमते रहते हैं ताकि आप व आपकी राशी सुरक्षित रहे|
उनका क्या जो बैंक में दिनभर आपकी क्रोध, खीज,व्यंग बाणों का शिकार होते हुए भी शांतचित्त आपकी सेवा में लगे रहते हैं, आपको तो एकाध घंटे ही लाइन में लगना है पर उन्हें तो दिनभर खीज,क्रोध झेलना है|

यदि ये सब आपके भाई बंद नहीं हैं तो क्या वे आपके भाई बंद हैं जो यह जानते बूझते कि आप ईमानदारी से टैक्स भर रहे हैं, वे टैक्स चोरी करके (जोकि अपने आप में राष्ट्र विरोधी गतिविधि है ) नोट दबा दबा कर रख रहे थे?
क्या वे आपके भाई बंद हैं जो अपनी गतिविधियों से आतंक फैला रहे थे? नकली नोटों से आपको हमें पूरे देश को ठग रहे थे, खून की नदियां बहा रहे थे?
और जिनके कारण मोदीजी को यह कठोर निर्णय करना पड़ा|

और आप कठोर साहसिक कदम की ऊपर ऊपर प्रशंसा करके, अपनी दिन दो दिन की परेशानी के बखान से साहसिक राष्ट्रहित के निर्णय की धज्जियाँ उदा रहे हैं |

आप यह भी तो कर सकते थे कि गुल्लक फोड़ कर चिल्लर पैसों से अपना काम चलाते, आखिर दूध सब्जी के लिए 100-200 से ऊपर कहाँ लगता है दो दिन में ?
50 दिन का समय है आपके पास,
धीरज से काम करते |
आपके इसी धीरज छोड़ने को "Intolerance" "असहिष्णुता" कहा जाता है |

धीरज से, विश्वास से काम करिये, ईमानदारी को सिस्टम में सहजता से लौटने दीजिये
उस ईमानदारी के कल का स्वागत उत्साह, सहिष्णुता, विश्वास से करिये,
और धन्यवाद करिये अपने सौभाग्य का, कि बेईमानी, विश्वासघात, असहिष्णुता, अत्याचार के युग की, पूरी शताब्दी की, समाप्ति हुई है
और वास्तविक स्वराज्य, सुराज्य का सूर्य निकल आया है |

देश के लिये जुट जाइये, अब हमें उन्नति, विकास, सुख, समृद्धि की राह पर तेजी से बढना है, भारत को विश्व गुरु बनाना है, भारत माता को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाना है |
जय हिन्द
जय भारत
भारत माता की जय

सोमवार, 7 नवंबर 2016

दिल्ली तथा मप्र प्रदूषण मुक्त करने हेतु आवश्यक हैं कुछ सख्त कदम

दिल्ली भी कभी भोपाल जैसा ही सुंदर साफ सुथरा शहर हुआ करता था ,1971 में जब पहली बार आया तो इस पर फ़िदा हो गया था।गुलाबी ठंड वाकई गुलाबी थी और धुंध वाकई ठंड वाली धुंध थी।
यमुना जी का पानी निर्मल स्वच्छ हुआ करता था,
नदी किनारों की फैक्ट्रियाँ तब बहुत अधिक ज़हर नदी में नहीं घोला करती थीं ।
कुछ फैक्ट्रियाँ धुंआ तो फेंकती थीं पर उनकी दुर्गन्ध साफ हवा में भी घुल कर साफ हो जाया करती थी।
बसें कारें तो थीं पर जाम लगता नहीं था,
एक सिटी बस जब बहुत धुंआ छोड़ रही थी तब एक चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस ने उसे रोक कर धुंआ कम करने की ताकीद की थी।
सुबह सुबह धान का पैरा जलने की सोंधी सोंधी सुगन्ध दोनों तीनों दिन आई थी,
पर धुंआ घनघोर नहीं होता था।
मैंने पूछा तो बताया गया कि ये खेतों का धुंआ कुछ दिन रहेगा ,खत्म हो जावेगा।
1976 में दिल्ली खामोश सी उदास सी बर्फ से नहाई सर्द से सदमे में थी।
1977 की इसी दिल्ली ने खामोश तख्ता पलट देखा था, फ़िज़ा तो मनोहारी थी, चारों ओर उल्लास विश्वास की सुगंध थी।
ठंडियाँ तो 1985 की शुरुआत में भी थीं पर माहौल डरावनी फिल्म की तरह सर्द और खामोश था, दिल्ली डरी सहमी सी थी।तब भी कोहरा सीधे जमीन पर बैठ जाया करता था और यमुनाजी के बदन पर तब भी फफोले नहीं पड़े थे।
2008 की सर्द होती गुलाबी सर्दी में बिटिया के विवाह में जब अम्लीय कोहरे व ठंड की मार पड़ने के कारण कुछ सम्बन्धियों को ब्रोंकाइटिस जैसा कष्ट होने लगा तो हमने मौसम के साथ ही साथ तेजी से बिगड़ती जा रही दिल्ली की फ़िज़ा पर अपनी चिंता अपने समधियों पर ज़ाहिर की व उन्हें सावधानियाँ रखने का अनुरोध किया।
समधीजी बिटिया व दामादजी के आग्रह के कारण कई बार हमें नवम्बर दिसम्बर में दिल्ली जाना पड़ा तब नाक मुँह ढकना नियमितता हो गई थी।
और साल आये, चले गए पर जब 2014 में माताजी की दशमी पूजा में पंडितजी ने यमुनाजी के जल से पवित्र होने की बात कही तो मैंने एसिड की घनघोर गंध होने के कारण उस जल को हाथ लगाने से भी मना कर दिया। यहाँ तक कि पूजा सामग्री का विसर्जन हमने घर से लाये जल से किया व निथरी सामग्री एक अख़बार में लपेट कर रास्ते के डस्टबिन में छोड़ी थी। (मंत्राग्नि देने के कारण पंच अस्थियाँ चुनने की आवश्यकता नहीं थी।) उस प्रदूषित जल में वह सामग्री भी हम छोड़ना नहीं चाहते थे।
अब नातियों, समधन के हालचाल पूछते समय नाक मुँह ढकने के बारे दामाद बेटी से पूछना नही भूलते।
दिल्ली अब बच्चों के रहने लायक नहीं रही । पचीसों बीमारियाँ बारहों माह खतरनाक पँजों में बच्चों को लीलना चाहती हैं।
इस शहर को फिर से स्वच्छ करने के लिए कुछ सख़्त कदम जरूरी हैं।
1. सारी फ़ैक्ट्रियों, चमड़ा फैक्ट्रीज सहित सभी को धुंआं व पानी पूर्ण रूप से साफ करके ही वातावरण में छोड़ना होगा। धुंआ व पानी अम्लता में शून्य ही हों। फ़िलहाल एक सप्ताह सभी फैक्ट्रियाँ बन्द रखी जावें।
2. सारी नालियों नालों का पानी साफ करने के लिए स्थान स्थान पर Sewage Treatment Plants के माध्यम से सफाई अभियान चलाना होगा।
3. मोटर गाड़ियों की बिक्री में कमी करनी होगी।तथा चलने वाली सभी गाड़ियों में प्रदूषण मानक उच्चतम स्तर पर रखने होंगे तथा सरकारी बसों व कारों पर भी अनिवार्य रूप से लागू हों। अन्य शहरों से आने वाले वाहनों पर यही मानक लागु हों। फ़िलहाल एक सप्ताह 10 वर्ष से अधिक पुराने वाहन तथा प्रदूषण फैलाने वाले वाहन सड़क पर न उतरें।
4. खाद्यान्न, खाद्योपयोगी सामग्री व सब्जियों में किसी प्रकार की मिलावट , रासायनिक वस्तु प्रयोग पूर्ण निषिद्ध हों।
अभी इतना ही करें तो लगभग 50% राहत तो अवश्य मिलेगी।
मप्र के भोपाल, इंदौर, जबलपुर, कटनी,उज्जैन,सतना व रीवा को अगले 5 साल में अपनी हवा पिछले 10 वर्ष पूर्व की हवा की जैसी बनाने हेतु कठोर कदम उठाने होंगे।