मेरे पिता श्री चंद्रशेखर केशव सप्रे का दिनांक 3 अक्टूबर 2011 को हृदयगति रुकने से निधन हो गया | 1२ मार्च 2011 को उन्होंने 85 वर्ष पूर्ण किये थे | प्रतिदिन प्रात: सायं 5-6 किमी भ्रमण उनके जीवन का अविभाज्य अंग था |80 वर्ष पूर्ण होते होते भी कोई रोग नहीं हुआ यह देखकर लोग अचम्भित हो जाते थे |शायद इसी की मानो उन्हें नजर लग गयी सितम्बर 2005 में उन्हें प्रात: भ्रमण करते समय हृदयाघात हुआ तथा उसी दोपहर उनकी angioplasty मनिपाल हॉस्पिटल बंगलुरु में हुई |समय समय पर ह्रुदयाघातों से उन्हें अमदावाद, मुंबई, गुडगाँव, भोपाल के अस्पतालों में भर्ती होना पड़ा | अंतिम दो माह उनका ह्रदय कमजोर होकर पम्पिंग रेट 20% रह गया था | अंतिम माह भोजन के प्रति अरुचि भी उन्हें हो गयी थी | सोडियम पोटेशियम इलेक्ट्रो लाइट्स के असंतुलन के कारण उन्हें 10 अगस्त 2011 से 13 अगस्त 2011 तथा 13 सितम्बर 2011 से 25 सितम्बर 2011 के बीच अक्षय हॉस्पिटल भोपाल में भर्ती रहे | 2 अक्टूबर को वे बाथरूम में गिर गए परन्तु भगवान की दया से कोई समस्या नहीं हुई | अक्षय में उन्हें observation के लिए डॉक्टर ने भर्ती करवा लिया और सभी ठीक होने के कारण 4-5 घंटे के बाद छोड़ भी दिया | सोडियम कम होने के कारण दवा भी उन्होंने दी थी |
रात सूप लिया तथा कई दिनों के बाद तीन बजे दूध रोटी मांगी फिर दूध माँगा | 4 बजे मैं सोने गया और सुबह 6.15 के लगभग मैं उठकर पुन: उनके पास गया जहाँ उन्होंने मुझे देखा फिर शांत निद्र्स्थ हो गए | निद्रा में ही वे 7-7.30 के बीच चिर निद्रा में लीन हो गए |
हम सभी उनके जाने से अनाथ हो गए हैं |
12/03/1926 को उनका जन्म खुरई जिला सागर मप्र में हुआ था | खुरई में माध्यमिक शाला में पढाई के पश्चात वे इंटर की पढाई करने कानपूर चले गए कानपूर में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नियमित स्वयंसेवक बन गए |
सागर विश्वविद्यालय से हिंदी व अंग्रेजी साहित्य में बी ए किया तथा मुगेली (छत्तीसगढ़ ) में शासकीय शाला में पढाने लगे | वहाँ से अंबिकापुर जाने पर 1948 में महाराष्ट्रियन होने के कारण उनके मित्र श्री तानसिंह गोंटिया ने उन्हें एक सप्ताह छिपा कर रखा ताकि महात्मा गाँधी की मृत्यु के पश्चात महाराष्ट्रियन लोगों पर होने वाली बदले की कार्यवाही से उन्हें बचाया जा सके | यह उल्लेखनीय है कि सन 1950 में उनका विवाह जबलपुर के खंडकर परिवार में हुआ जिनका एक पुत्र प्रभाकर रास्वसं के स्वयंसेवक होने के कारण जबलपुर के ही एक अन्य सप्रे , घाटे तथा परांजपे परिवारों के सदस्यों के साथ जेल में बंद किया गया था | उनका व पत्नी श्रीमती नलिनी का अंतिम समय तक साथ रहा | जबलपुर से बी एड करने के पश्चात हिंदी साहित्य में एम ए किया | मुंगेली अंबिकापुर मुंगेली अंबिकापुर रायगढ़ के पश्चात सन्ना(जशपुरनगर ) 1963 में प्राचार्य बनकर गए फिर बस्तर, करंजिया (मंडला), कुरई (सिवनी) , छपारा (सिवनी), दंतेवाडा (बस्तर), चुरहट (सीधी) आदि स्थानों पर उनका स्थानांतरण होता रहा | वे कुल 25 वर्ष प्राचार्य रहे |
इस पूरे जीवनकाल तथा सेवाकार्य में अपनी पत्नी यानि हमारी माताजी के साथ ही वे कहीं जाते आते थे कहीं भी वे अकेले नहीं गए न ही हमारी माताजी कहीं अकेली गईं | अंतिम समय तक की सारी सेवा माताजी ने ही की |
सन्ना में वनवासियों (Tribal) में श्रीराम एवं श्रीहनुमान के प्रति अनुराग को देखकर उन्होंने शाला के छात्रावास में शनिवार सायं को रामचरितमानस का पाठ, भजन कीर्तन का कार्यक्रम शुरू किया | जो धीरे धीरे अन्य शालाओं छात्रावासों में प्रचलित हो गया | आज भी वनवासी अंचलों के अनेक शाला छात्रावासों में शनिवार सायं का कीर्तन अबाध रूप से चल रहा है | इस कार्य के कारण ईसाई मिशनरियों के प्रलोभन के द्वारा तथा जबरन मतांतरण के कार्य में बाधा उत्पन्न हुई, जिससे मिशनरियों की नाराजी भी उन्हें झेलनी पडी | साथ ही सिद्धांतप्रिय, ईमानदार व भ्रष्टाचार से घृणा होने के कारण, कभी भ्रष्टाचार नहीं किया और किसी राजनैतिक या अन्य दबाव में नहीं आये| जिसके कारण उन्हें लगातार लंबे लंबे स्थानांतरण भी झेलने पड़े | जगदलपुर में उन्होंने वनवासी छात्रों के संभागीय ओलम्पिक के आयोजन समिति के सहप्रमुख का दायित्व सम्हाला, (आयोजन प्रमुख तत्कालीन कलेक्टर ब्रम्हदत्त शर्मा थे ( जिन्होंने दंतेवाडा की आदिवासी युवतियों पर अत्याचार करने वाले अनाचारी शासकीय सेवकों को दण्डित किया था)) |
जशपुरनगर में वनवासी कल्याण आश्रम में महर्षि मोरेश्वर राव उपाख्य मोरुभाऊ केतकर तथा आबा साहेब देशपांडे के संपर्क में आये तथा जीवन भर वनवासियों के प्रति समर्पित रहे | सेवानिवृत्ति के पश्चात विश्व हिंदू परिषद का कार्य उन्होंने हाथों में लिया तथा अयोध्या आन्दोलन में बढचढकर भाग लिया | वे झाँसी के पास गिरफ्तार कर लिए गए और 3 दिनों के बाद सतना की सीमा में रिहा किये गए | सन 2000 के पश्चात दैनंदिन कार्यक्रमों से उन्होंने सन्यास ले लिया परन्तु संघ के विभिन्न उत्सवों/कार्यक्रमों में वे उपस्थित होते रहे, चाहे मुंबई में छोटे भाई के पास हों या भोपाल/ग्वालियर में मेरे पास | परन्तु एक बार दादर स्टेशन पर लोकल से गिरने के बाद उन्होंने मुंबई में कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया | भैयाजी जोशी का भोपाल में वर्ग समाप्ति के पश्चात का कार्यक्रम उनका अंतिम कार्यक्रम था | गुरु पूजन कार्यक्रम भी उनकी ओर से मैंने ही किया |
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन इतिहास का एक सम्पूर्ण पन्ना होता है जिसमें चाहे जशपुर नगर से सन्ना का 58 किमी का वर्षा के मौसम में साइकिल या पैदल सफर हो, ईसाई पादरियों से उनके अनैतिक धर्मान्तरण के बारे में सीधी बहस हो, जंगल में जाते समय शेर परिवार से आमना सामना हो या अपनी शालाओं में अनुशासन की बात हो वे सदा निर्भीक कर्तव्यपरायण व्यक्ति के रूप में ही हमें दिखे | पपू गुरूजी,नानाजी देशमुख, दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी का बौद्धिक यदि निवास के शहर/गांव से २-३ घंटे की दूरी पर भी हो तो भी वे अवश्य जाते थे |
उनकी किसी भी शाला के वाचनालय की एक भी किताब ऐसी नहीं थी जो मैंने पढ़ी न हो | कोई भी पुस्तक नयी आये तो पहले मुझे दी जाते थी पढ़ने के लिए, सारांश लिखने के लिए | अंग्रेजी, हिंदी, मराठी की अनगिनत पुस्तकें पढ़ने का मुझे अवसर उन्ही के कारण मिला |
अनेक स्थानों पर मराठी में बात करने वाले हम परिवार के सिर्फ 4-5 लोग ही हुआ करते थे परन्तु अनेकानेक बोलियों के मध्य भी हमने मराठी में बात करने का उपक्रम जारी रखा तथा हम अभी भी घर में अपनी मातृभाषा में ही बात करते हैं , पत्र लिखने के दिनों में मातृभाषा में ही पत्र लिखते थे |
देश की वर्तमान परिस्थिति से वे अत्यंत दुखी थे | 1947 का विभाजन उन्होंने अपनी आँखों देखा था | अटलजी पर उन्हें अटूट श्रद्धा थी महात्मा गाँधी पर विश्वास और नेहरु-गाँधी परिवार के सदस्यों की बनावटी कलाबाजियों पर नाराजी | मोरारजी देसाई चरणसिंह देवीलाल विश्वनाथ प्रतापसिंह देवेगौड़ा जैसों को भी वे लोकतंत्र के हत्यारे, और कांग्रेस के पोषक मानते थे |
कोई भी कार्य पूर्ण मनोयोग श्रद्धा से करो यह उनका मूल मंत्र रहा है "भगवान फल अवश्य देगा भले देर से दे और आपको श्रेय न दे" |
श्रीराम जयराम जयजयराम यह उनका मन्त्र था व रामचरितमानस नियमित पठन का ग्रन्थ | एक वर्ष में साधारणत: 4-5 पाठ आसानी से हो जाते थे |
उन्हें हम सभी नियमित स्मरण करते रहें यह निवेदन|
रात सूप लिया तथा कई दिनों के बाद तीन बजे दूध रोटी मांगी फिर दूध माँगा | 4 बजे मैं सोने गया और सुबह 6.15 के लगभग मैं उठकर पुन: उनके पास गया जहाँ उन्होंने मुझे देखा फिर शांत निद्र्स्थ हो गए | निद्रा में ही वे 7-7.30 के बीच चिर निद्रा में लीन हो गए |
हम सभी उनके जाने से अनाथ हो गए हैं |
12/03/1926 को उनका जन्म खुरई जिला सागर मप्र में हुआ था | खुरई में माध्यमिक शाला में पढाई के पश्चात वे इंटर की पढाई करने कानपूर चले गए कानपूर में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नियमित स्वयंसेवक बन गए |
सागर विश्वविद्यालय से हिंदी व अंग्रेजी साहित्य में बी ए किया तथा मुगेली (छत्तीसगढ़ ) में शासकीय शाला में पढाने लगे | वहाँ से अंबिकापुर जाने पर 1948 में महाराष्ट्रियन होने के कारण उनके मित्र श्री तानसिंह गोंटिया ने उन्हें एक सप्ताह छिपा कर रखा ताकि महात्मा गाँधी की मृत्यु के पश्चात महाराष्ट्रियन लोगों पर होने वाली बदले की कार्यवाही से उन्हें बचाया जा सके | यह उल्लेखनीय है कि सन 1950 में उनका विवाह जबलपुर के खंडकर परिवार में हुआ जिनका एक पुत्र प्रभाकर रास्वसं के स्वयंसेवक होने के कारण जबलपुर के ही एक अन्य सप्रे , घाटे तथा परांजपे परिवारों के सदस्यों के साथ जेल में बंद किया गया था | उनका व पत्नी श्रीमती नलिनी का अंतिम समय तक साथ रहा | जबलपुर से बी एड करने के पश्चात हिंदी साहित्य में एम ए किया | मुंगेली अंबिकापुर मुंगेली अंबिकापुर रायगढ़ के पश्चात सन्ना(जशपुरनगर ) 1963 में प्राचार्य बनकर गए फिर बस्तर, करंजिया (मंडला), कुरई (सिवनी) , छपारा (सिवनी), दंतेवाडा (बस्तर), चुरहट (सीधी) आदि स्थानों पर उनका स्थानांतरण होता रहा | वे कुल 25 वर्ष प्राचार्य रहे |
इस पूरे जीवनकाल तथा सेवाकार्य में अपनी पत्नी यानि हमारी माताजी के साथ ही वे कहीं जाते आते थे कहीं भी वे अकेले नहीं गए न ही हमारी माताजी कहीं अकेली गईं | अंतिम समय तक की सारी सेवा माताजी ने ही की |
सन्ना में वनवासियों (Tribal) में श्रीराम एवं श्रीहनुमान के प्रति अनुराग को देखकर उन्होंने शाला के छात्रावास में शनिवार सायं को रामचरितमानस का पाठ, भजन कीर्तन का कार्यक्रम शुरू किया | जो धीरे धीरे अन्य शालाओं छात्रावासों में प्रचलित हो गया | आज भी वनवासी अंचलों के अनेक शाला छात्रावासों में शनिवार सायं का कीर्तन अबाध रूप से चल रहा है | इस कार्य के कारण ईसाई मिशनरियों के प्रलोभन के द्वारा तथा जबरन मतांतरण के कार्य में बाधा उत्पन्न हुई, जिससे मिशनरियों की नाराजी भी उन्हें झेलनी पडी | साथ ही सिद्धांतप्रिय, ईमानदार व भ्रष्टाचार से घृणा होने के कारण, कभी भ्रष्टाचार नहीं किया और किसी राजनैतिक या अन्य दबाव में नहीं आये| जिसके कारण उन्हें लगातार लंबे लंबे स्थानांतरण भी झेलने पड़े | जगदलपुर में उन्होंने वनवासी छात्रों के संभागीय ओलम्पिक के आयोजन समिति के सहप्रमुख का दायित्व सम्हाला, (आयोजन प्रमुख तत्कालीन कलेक्टर ब्रम्हदत्त शर्मा थे ( जिन्होंने दंतेवाडा की आदिवासी युवतियों पर अत्याचार करने वाले अनाचारी शासकीय सेवकों को दण्डित किया था)) |
जशपुरनगर में वनवासी कल्याण आश्रम में महर्षि मोरेश्वर राव उपाख्य मोरुभाऊ केतकर तथा आबा साहेब देशपांडे के संपर्क में आये तथा जीवन भर वनवासियों के प्रति समर्पित रहे | सेवानिवृत्ति के पश्चात विश्व हिंदू परिषद का कार्य उन्होंने हाथों में लिया तथा अयोध्या आन्दोलन में बढचढकर भाग लिया | वे झाँसी के पास गिरफ्तार कर लिए गए और 3 दिनों के बाद सतना की सीमा में रिहा किये गए | सन 2000 के पश्चात दैनंदिन कार्यक्रमों से उन्होंने सन्यास ले लिया परन्तु संघ के विभिन्न उत्सवों/कार्यक्रमों में वे उपस्थित होते रहे, चाहे मुंबई में छोटे भाई के पास हों या भोपाल/ग्वालियर में मेरे पास | परन्तु एक बार दादर स्टेशन पर लोकल से गिरने के बाद उन्होंने मुंबई में कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया | भैयाजी जोशी का भोपाल में वर्ग समाप्ति के पश्चात का कार्यक्रम उनका अंतिम कार्यक्रम था | गुरु पूजन कार्यक्रम भी उनकी ओर से मैंने ही किया |
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन इतिहास का एक सम्पूर्ण पन्ना होता है जिसमें चाहे जशपुर नगर से सन्ना का 58 किमी का वर्षा के मौसम में साइकिल या पैदल सफर हो, ईसाई पादरियों से उनके अनैतिक धर्मान्तरण के बारे में सीधी बहस हो, जंगल में जाते समय शेर परिवार से आमना सामना हो या अपनी शालाओं में अनुशासन की बात हो वे सदा निर्भीक कर्तव्यपरायण व्यक्ति के रूप में ही हमें दिखे | पपू गुरूजी,नानाजी देशमुख, दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी का बौद्धिक यदि निवास के शहर/गांव से २-३ घंटे की दूरी पर भी हो तो भी वे अवश्य जाते थे |
उनकी किसी भी शाला के वाचनालय की एक भी किताब ऐसी नहीं थी जो मैंने पढ़ी न हो | कोई भी पुस्तक नयी आये तो पहले मुझे दी जाते थी पढ़ने के लिए, सारांश लिखने के लिए | अंग्रेजी, हिंदी, मराठी की अनगिनत पुस्तकें पढ़ने का मुझे अवसर उन्ही के कारण मिला |
अनेक स्थानों पर मराठी में बात करने वाले हम परिवार के सिर्फ 4-5 लोग ही हुआ करते थे परन्तु अनेकानेक बोलियों के मध्य भी हमने मराठी में बात करने का उपक्रम जारी रखा तथा हम अभी भी घर में अपनी मातृभाषा में ही बात करते हैं , पत्र लिखने के दिनों में मातृभाषा में ही पत्र लिखते थे |
देश की वर्तमान परिस्थिति से वे अत्यंत दुखी थे | 1947 का विभाजन उन्होंने अपनी आँखों देखा था | अटलजी पर उन्हें अटूट श्रद्धा थी महात्मा गाँधी पर विश्वास और नेहरु-गाँधी परिवार के सदस्यों की बनावटी कलाबाजियों पर नाराजी | मोरारजी देसाई चरणसिंह देवीलाल विश्वनाथ प्रतापसिंह देवेगौड़ा जैसों को भी वे लोकतंत्र के हत्यारे, और कांग्रेस के पोषक मानते थे |
कोई भी कार्य पूर्ण मनोयोग श्रद्धा से करो यह उनका मूल मंत्र रहा है "भगवान फल अवश्य देगा भले देर से दे और आपको श्रेय न दे" |
श्रीराम जयराम जयजयराम यह उनका मन्त्र था व रामचरितमानस नियमित पठन का ग्रन्थ | एक वर्ष में साधारणत: 4-5 पाठ आसानी से हो जाते थे |
उन्हें हम सभी नियमित स्मरण करते रहें यह निवेदन|